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BPSC CCEभारतीय राजव्यवस्थामौलिक अधिकार, नीति निदेशक तत्व एवं मौलिक कर्तव्य
Fundamental Rights, Directive Principles of State Policy, and Fundamental Duties
यह अध्याय BPSC प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा दोनों के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रारंभिक परीक्षा में अनुच्छेदों, रिटों और संवैधानिक संशोधनों से सीधे वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाते हैं। मुख्य परीक्षा में मौलिक अधिकारों एवं नीति निदेशक तत्वों के अंतर-संबंधों पर विश्लेषणात्मक प्रश्न आते हैं।
मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 12 से 35 एवं छह अधिकार
भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जिसे 'भारत का मैग्नाकार्टा' कहा जाता है। यह अधिकार अमेरिकी संविधान के 'बिल ऑफ राइट्स' से प्रेरित हैं और नागरिकों को राज्य की निरंकुश सत्ता के विरुद्ध गारंटी प्रदान करते हैं। मूल संविधान में कुल सात मौलिक अधिकार शामिल थे, परंतु 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 31) को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर अनुच्छेद 300A के तहत विधिक अधिकार बना दिया गया। वर्तमान में भारतीय नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। ये अधिकार असीमित या निरपेक्ष नहीं हैं, बल्कि राज्य इन पर लोक व्यवस्था, नैतिकता और सुरक्षा के आधार पर उचित प्रतिबंध (युक्तिसंगत निर्बंधन) लगा सकता है।
मुख्य तथ्य
- मौलिक अधिकार भारतीय संविधान के भाग-3 तथा अनुच्छेद 12 से 35 तक वर्णित हैं।
- संविधान के भाग-3 को 'भारत का मैग्नाकार्टा' की संज्ञा दी गई है।
- मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे, किंतु 44वें संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा संपत्ति के अधिकार को हटा दिया गया।
- वर्तमान में संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300A के तहत केवल एक विधिक या कानूनी अधिकार है।
- अनुच्छेद 12 में मौलिक अधिकारों के संदर्भ में 'राज्य' की परिभाषा दी गई है।
- अनुच्छेद 13 घोषित करता है कि मौलिक अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियां शून्य होंगी (न्यायिक पुनरावलोकन का आधार)।
- अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता (ब्रिटेन से) और विधियों के समान संरक्षण (अमेरिका से) का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध करता है।
- अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता (छुआछूत) का पूर्ण उन्मूलन किया गया है और इसका आचरण दंडनीय अपराध है।
- अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत नागरिकों को 6 लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं (वाक्, सम्मेलन, संघ, संचरण, निवास, व्यापार) प्राप्त हैं।
- अनुच्छेद 21A को 86वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा जोड़ा गया, जो 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 20 और 21 राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान भी निलंबित नहीं किए जा सकते।
- अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 और 30 केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं, विदेशियों को नहीं।
- अनुच्छेद 23 मानव दुर्व्यापार व बंधुआ मजदूरी तथा अनुच्छेद 24 कारखानों आदि में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन पर रोक लगाता है।
- डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) को 'संविधान की आत्मा और हृदय' कहा था।
तालिका
- क्रम: 1 · मौलिक अधिकार का नाम: समानता का अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 14 - 18 · मुख्य विषय: विधि के समक्ष समता, भेदभाव की समाप्ति, अवसर की समता, अस्पृश्यता व उपाधियों का अंत
- क्रम: 2 · मौलिक अधिकार का नाम: स्वतंत्रता का अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 19 - 22 · मुख्य विषय: 6 लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं, अपराधों की दोषसिद्धि में संरक्षण, जीवन का अधिकार (21), शिक्षा का अधिकार (21A)
- क्रम: 3 · मौलिक अधिकार का नाम: शोषण के विरुद्ध अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 23 - 24 · मुख्य विषय: मानव दुर्व्यापार व जबरन श्रम पर रोक (23), कारखानों में बालश्रम पर रोक (24)
- क्रम: 4 · मौलिक अधिकार का नाम: धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 25 - 28 · मुख्य विषय: अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म प्रचार, धार्मिक मामलों का प्रबंधन और धार्मिक करों से छूट
- क्रम: 5 · मौलिक अधिकार का नाम: संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 29 - 30 · मुख्य विषय: अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण और उन्हें शिक्षण संस्थान स्थापित करने व चलाने का अधिकार
- क्रम: 6 · मौलिक अधिकार का नाम: संवैधानिक उपचारों का अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 32 · मुख्य विषय: मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सर्वोच्च न्यायालय जाने और 5 प्रकार की रिट जारी कराने का अधिकार
अभ्यास प्रश्न (हल सहित)
- प्रश्न 1: भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है और किसी भी रूप में इसका आचरण निषिद्ध है?
(क) अनुच्छेद 14 (ख) अनुच्छेद 17 (ग) अनुच्छेद 18 (घ) अनुच्छेद 19
- ✔ उत्तर: (ख) अनुच्छेद 17 — अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का पूर्ण अंत करता है और इसका किसी भी रूप में आचरण विधि के अनुसार दंडनीय अपराध घोषित करता है।
- प्रश्न 2: निम्नलिखित में से कौन-सा मौलिक अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है, विदेशियों को नहीं?
(क) विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 14) (ख) प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21) (ग) लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता (अनुच्छेद 16) (घ) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25)
- ✔ उत्तर: (ग) लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता (अनुच्छेद 16) — अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 और 30 केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त अधिकार हैं।
- प्रश्न 3: 44वें संविधान संशोधन अधिनियम (1978) द्वारा किस मौलिक अधिकार को समाप्त कर एक कानूनी अधिकार बना दिया गया?
(क) समानता का अधिकार (ख) शोषण के विरुद्ध अधिकार (ग) संपत्ति का अधिकार (घ) सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार
- ✔ उत्तर: (ग) संपत्ति का अधिकार — 44वें संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 31) को मौलिक अधिकार से हटाकर अनुच्छेद 300A के तहत कानूनी अधिकार बनाया गया।
- प्रश्न 4: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के लागू रहने पर भी राष्ट्रपति द्वारा किन मौलिक अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता?
(क) अनुच्छेद 14 और 19 (ख) अनुच्छेद 19 और 20 (ग) अनुच्छेद 20 और 21 (घ) अनुच्छेद 21 और 22
- ✔ उत्तर: (ग) अनुच्छेद 20 और 21 — 44वें संविधान संशोधन 1978 के अनुसार आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 और 21 के अधिकारों का निलंबन नहीं किया जा सकता।
- प्रश्न 5: मौलिक अधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौलिक अधिकार असीमित और पूर्णतः निरपेक्ष हैं।
2. 86वें संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा अनुच्छेद 21A को जोड़ा गया।
3. डॉ. आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को 'संविधान की आत्मा' कहा था।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 और 2 (ख) केवल 2 और 3 (ग) केवल 1 और 3 (घ) 1, 2 और 3
- ✔ उत्तर: (ख) केवल 2 और 3 — मौलिक अधिकार निरपेक्ष (absolute) नहीं हैं, बल्कि इन पर राज्य द्वारा युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं, इसलिए कथन 1 गलत है।
- प्रश्न 6: भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद बालश्रम (14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के कारखानों में नियोजन) को पूर्णतः प्रतिषिद्ध करता है?
(क) अनुच्छेद 23 (ख) अनुच्छेद 24 (ग) अनुच्छेद 21A (घ) अनुच्छेद 25
- ✔ उत्तर: (ख) अनुच्छेद 24 — अनुच्छेद 24 जोखिम भरे उद्योगों और कारखानों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन का प्रतिषेध करता है (जबकि अनु. 23 मानव दुर्व्यापार पर रोक लगाता है)।
📜 असली पिछले वर्ष के प्रश्न (BPSC)
- [BPSC 71वीं प्रारंभिक (13 सितंबर 2025), प्रश्न 63] भारतीय संविधान मौलिक अधिकारों पर औचित्यपूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान करता है किन्तु औचित्य को ध्यान में रखना चाहिए कि :
1) सामान्य जन का हित संरक्षित हो
2) विद्यमान सामाजिक मूल्य एवं सामाजिक आवश्यकताएं अवरोध न हो।
3) राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को नजर अंदाज किया जा सकता है।
4) सामूहिक हित बृहत्तर नही है।
इनमें से :
(क) 1 और 2 सही है (ख) 2 और 3 सही है (ग) केवल 4 सही है (घ) केवल 1 सही है
- ✔ आधिकारिक उत्तर: (क) 1 और 2 सही है — मौलिक अधिकार असीमित नहीं हैं। उन पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाते समय जनहित का संरक्षण होना चाहिए तथा समाज के स्थापित नैतिक मूल्यों एवं अनिवार्य आवश्यकताओं में अवांछित बाधा नहीं आनी चाहिए।
परीक्षा में कैसे आता है
BPSC CCE और बिहार दरोगा में मौलिक अधिकारों से हर वर्ष 1 से 3 प्रश्न निश्चित पूछे जाते हैं। आयोग अनुच्छेदों के मिलान (जैसे अनु. 17, 21, 24), केवल नागरिकों को प्राप्त अधिकारों (15, 16, 19, 29, 30), आपातकाल में गैर-निलंबित अधिकारों (20, 21) और 44वें व 86वें संविधान संशोधनों पर सीधे या कूट आधारित प्रश्न पूछता है।
इनमें भ्रम न करें
- ✘ अनुच्छेद 23 और अनुच्छेद 24 में भ्रम: अनुच्छेद 23 मानव तस्करी, बेगार व बंधुआ मजदूरी पर रोक लगाता है, जबकि अनुच्छेद 24 कारखानों में 14 वर्ष से कम उम्र के बालश्रम पर रोक लगाता है।
- ✘ मौलिक अधिकार और कानूनी अधिकार में अंतर: संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है; 44वें संशोधन 1978 के बाद यह भाग-12 के अनुच्छेद 300A के अंतर्गत केवल एक वैधानिक/कानूनी अधिकार है।
- ✘ सभी व्यक्ति बनाम केवल नागरिक: अनुच्छेद 14, 20, 21, 21A, 22, 23, 24, 25, 26, 27, 28 सभी व्यक्तियों (विदेशियों सहित) को प्राप्त हैं, जबकि 15, 16, 19, 29, 30 केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं।
💡 याद रखें ट्रिक: 'समस्त शोध संस्कृति के उपचार' (सम = समानता 14-18, स्त = स्वतंत्रता 19-22, शो = शोषण के विरुद्ध 23-24, ध = धार्मिक स्वतंत्रता 25-28, संस्कृति = सांस्कृतिक व शैक्षिक 29-30, उपचार = संवैधानिक उपचार 32)।
रिट (संवैधानिक उपचार)
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए न्यायपालिका को रिट जारी करने की असाधारण शक्ति दी गई है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को 'संविधान का हृदय और आत्मा' कहा था क्योंकि इसके बिना मौलिक अधिकार अर्थहीन हो जाते हैं। उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए 5 प्रकार की रिटें जारी कर सकता है। वहीं उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य सामान्य कानूनी अधिकारों के उल्लंघन पर भी रिट जारी करने का अधिकार प्राप्त है। ये पाँच रिटें हैं—बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा। भारत में रिट क्षेत्राधिकार की यह संकल्पना ब्रिटिश विधि (विशेषाधिकार रिट) से ली गई है।
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय रिट जारी कर सकते हैं।
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को 'संविधान की आत्मा और हृदय' कहा था।
- भारतीय संविधान में कुल पाँच प्रकार की रिटों का उल्लेख है: बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा।
- उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 226) उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) की तुलना में अधिक व्यापक है।
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) का शाब्दिक अर्थ 'सशरीर प्रस्तुत करना' (To have the body of) होता है।
- बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट सार्वजनिक प्राधिकरणों और निजी व्यक्तियों दोनों के विरुद्ध जारी की जा सकती है।
- परमादेश (Mandamus) का शाब्दिक अर्थ 'हम आदेश देते हैं' (We Command) है।
- परमादेश रिट किसी निजी व्यक्ति, भारत के राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध जारी नहीं की जा सकती।
- प्रतिषेध (Prohibition) का शाब्दिक अर्थ 'मना करना' या 'रोकना' (To forbid) है, जो केवल न्यायिक व अर्द्ध-न्यायिक निकायों के विरुद्ध जारी होता है।
- उत्प्रेषण (Certiorari) का शाब्दिक अर्थ 'प्रमाणित होना' या 'पूर्णतः सूचित किया जाना' (To be certified) है।
- प्रतिषेध केवल निवारक (preventive) है, जबकि उत्प्रेषण निवारक और उपचारात्मक (curative) दोनों है।
- अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) का शाब्दिक अर्थ 'किस अधिकार या वारंट से' (By what authority) है।
- अधिकार-पृच्छा केवल सार्वजनिक कार्यालयों (सार्वजनिक पदों) की संवैधानिकता जांचने के लिए जारी की जाती है, निजी कार्यालयों के लिए नहीं।
- संसद अनुच्छेद 32(3) के तहत कानून बनाकर किसी अन्य अधीनस्थ न्यायालय को भी रिट जारी करने का अधिकार दे सकती है।
तालिका
- रिट का नाम: बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) · शाब्दिक अर्थ: सशरीर प्रस्तुत किया जाए · किसके विरुद्ध जारी होती है?: सार्वजनिक एवं निजी दोनों निकाय · प्रमुख उद्देश्य: अवैध रूप से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को रिहा कराना
- रिट का नाम: परमादेश (Mandamus) · शाब्दिक अर्थ: हम आदेश देते हैं · किसके विरुद्ध जारी होती है?: केवल सार्वजनिक अधिकारी, अधीनस्थ न्यायालय, सरकार · प्रमुख उद्देश्य: सार्वजनिक या विधिक कर्तव्य के पालन हेतु बाध्य करना
- रिट का नाम: प्रतिषेध (Prohibition) · शाब्दिक अर्थ: मना करना / रोकना · किसके विरुद्ध जारी होती है?: न्यायिक एवं अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकरण · प्रमुख उद्देश्य: अधीनस्थ न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करने से रोकना (निवारक)
- रिट का नाम: उत्प्रेषण (Certiorari) · शाब्दिक अर्थ: प्रमाणित होना / पूर्णतः सूचित होना · किसके विरुद्ध जारी होती है?: न्यायिक, अर्द्ध-न्यायिक एवं प्रशासनिक प्राधिकरण · प्रमुख उद्देश्य: अधिकार क्षेत्र की त्रुटि या प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर निर्णय को रद्द करना (उपचारात्मक)
- रिट का नाम: अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) · शाब्दिक अर्थ: किस अधिकार या वारंट से · किसके विरुद्ध जारी होती है?: सार्वजनिक कार्यालय धारक व्यक्ति · प्रमुख उद्देश्य: किसी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक पद के अवैध अनाधिकार ग्रहण को रोकना
अभ्यास प्रश्न (हल सहित)
- प्रश्न 7: संविधान के किस अनुच्छेद को डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने 'संविधान की आत्मा और हृदय' कहा था?
(क) अनुच्छेद 14 (ख) अनुच्छेद 19 (ग) अनुच्छेद 21 (घ) अनुच्छेद 32
- ✔ उत्तर: (घ) अनुच्छेद 32 — डॉ. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) को संविधान का हृदय और आत्मा कहा था क्योंकि यह मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराता है।
- प्रश्न 8: निम्नलिखित में से कौन-सी रिट सार्वजनिक और निजी दोनों व्यक्तियों के विरुद्ध जारी की जा सकती है?
(क) परमादेश (ख) बंदी प्रत्यक्षीकरण (ग) प्रतिषेध (घ) अधिकार-पृच्छा
- ✔ उत्तर: (ख) बंदी प्रत्यक्षीकरण — बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) एकमात्र ऐसी रिट है जो राज्य के अधिकारियों तथा निजी व्यक्तियों दोनों के विरुद्ध अवैध निरोध के मामले में जारी हो सकती है।
- प्रश्न 9: उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार के संबंध में कौन-सा कथन सत्य है?
(क) उच्चतम न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्च न्यायालय से व्यापक है। (ख) उच्च न्यायालय केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी कर सकता है। (ग) उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय से अधिक व्यापक है। (घ) अनुच्छेद 32 के तहत उच्च न्यायालय रिट जारी करता है।
- ✔ उत्तर: (ग) उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय से अधिक व्यापक है। — अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के अलावा अन्य विधिक अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है, अतः इसका क्षेत्राधिकार व्यापक है।
- प्रश्न 10: 'हम आदेश देते हैं' (We Command) किस रिट का शाब्दिक अर्थ है?
(क) बंदी प्रत्यक्षीकरण (ख) परमादेश (ग) उत्प्रेषण (घ) अधिकार-पृच्छा
- ✔ उत्तर: (ख) परमादेश — परमादेश (Mandamus) लैटिन शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ 'हम आदेश देते हैं' होता है, जो सार्वजनिक कर्तव्य के पालन हेतु दिया जाता है।
- प्रश्न 11: अवैध रूप से किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को उस पद से हटाने हेतु न्यायालय कौन-सी रिट जारी करता है?
(क) अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) (ख) प्रतिषेध (Prohibition) (ग) उत्प्रेषण (Certiorari) (घ) बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
- ✔ उत्तर: (क) अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) — अधिकार-पृच्छा रिट तब जारी की जाती है जब किसी व्यक्ति द्वारा किसी सार्वजनिक पद को अवैध रूप से धारण किया गया हो।
- प्रश्न 12: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रतिषेध रिट वरिष्ठ न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकने हेतु जारी की जाती है।
2. उत्प्रेषण रिट केवल निवारक (preventive) प्रकृति की होती है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 (ख) केवल 2 (ग) 1 और 2 दोनों (घ) न तो 1 और न ही 2
- ✔ उत्तर: (क) केवल 1 — कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है क्योंकि उत्प्रेषण निवारक के साथ-साथ उपचारात्मक (curative) भी होती है, जबकि प्रतिषेध केवल निवारक होती है।
परीक्षा में कैसे आता है
BPSC प्रारंभिक परीक्षा में रिटों के लैटिन अर्थ (शाब्दिक अर्थ), अनुच्छेदों (अनुच्छेद 32 बनाम अनुच्छेद 226), रिटों के प्रकार, तथा किन परिस्थितियों एवं किसके विरुद्ध (सार्वजनिक या निजी निकाय) ये रिटें जारी की जाती हैं—इस पर प्रत्यक्ष व कूट-आधारित प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।
इनमें भ्रम न करें
- ✘ प्रतिषेध और उत्प्रेषण में भ्रम: प्रतिषेध (Prohibition) तब जारी होता है जब कार्यवाही चल रही हो (रोकने हेतु), जबकि उत्प्रेषण (Certiorari) फैसला आ जाने के बाद निर्णय को रद्द करने या मामला स्थानांतरित करने हेतु जारी होता है।
- ✘ अनुच्छेद 32 बनाम अनुच्छेद 226 का दायरा: अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है लेकिन केवल भाग-3 के लिए सीमित है; जबकि अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकार नहीं है परंतु इसका दायरा सामान्य विधिक अधिकारों तक भी विस्तृत है।
- ✘ निजी व्यक्तियों के विरुद्ध रिट: परमादेश, प्रतिषेध और उत्प्रेषण कभी भी निजी व्यक्तियों के विरुद्ध जारी नहीं होते; केवल बंदी प्रत्यक्षीकरण ही निजी व्यक्ति के विरुद्ध जारी हो सकती है।
💡 ट्रिक: 'CPM HQ' (Certiorari, Prohibition, Mandamus, Habeas corpus, Quo-warranto) — बंदी को शरीर दो (Habeas), हम आदेश दें (Mandamus), काम रोको (Prohibition), रिकॉर्ड भेजो (Certiorari), हक बताओ (Quo-warranto)।
राज्य के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 36-51 एवं वर्गीकरण)
भारतीय संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) का उल्लेख है, जिन्हें आयरलैंड के संविधान से लिया गया है। इनका मुख्य उद्देश्य भारत में एक 'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की स्थापना करना तथा सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र को सुनिश्चित करना है। यद्यपि संविधान में इनका कोई औपचारिक विभाजन नहीं किया गया है, तथापि इनकी वैचारिक प्रकृति के आधार पर इन्हें तीन श्रेणियों—समाजवादी, गांधीवादी और उदार बौद्धिक सिद्धांतों में वर्गीकृत किया जाता है। अनुच्छेद 37 स्पष्ट करता है कि ये तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (गैर-न्यायोचित) नहीं हैं, किंतु देश के शासन में मूलभूत हैं। डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने इन तत्वों को भारतीय संविधान की 'अनूठी विशेषता' (Novel Feature) कहा था।
मुख्य तथ्य
- नीति निदेशक तत्वों की संकल्पना आयरलैंड के संविधान से ली गई है, जिसने इसे स्पेन के संविधान से ग्रहण किया था।
- संविधान का अनुच्छेद 36 राज्य की वही परिभाषा देता है जो भाग III के अनुच्छेद 12 में दी गई है।
- अनुच्छेद 37 के अनुसार DPSP न्यायालय द्वारा गैर-प्रवर्तनीय (Non-justiciable) हैं, किंतु शासन व्यवस्था में मूलभूत हैं।
- अनुच्छेद 39(b) और 39(c) भौतिक संसाधनों के स्वामित्व के वितरण और धन के संकेंद्रण की रोकथाम से संबंधित समाजवादी सिद्धांत हैं।
- अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता) को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायतों के गठन और उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने की बात करता है (गांधीवादी सिद्धांत)।
- अनुच्छेद 43B (सहकारी समितियों का संवर्धन) को 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा संविधान में जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 44 पूरे देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 45 को 86वें संविधान संशोधन, 2002 द्वारा संशोधित कर 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा से जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 48A (पर्यावरण, वन और वन्यजीवों का संरक्षण) को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा शामिल किया गया।
- अनुच्छेद 50 कार्यपालिका से न्यायपालिका के पृथक्करण (Separation of Judiciary from Executive) का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि तथा अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रति आदर बढ़ाने का निर्देश देता है।
तालिका
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अभ्यास प्रश्न (हल सहित)
- प्रश्न 13: भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद 'कार्यपालिका से न्यायपालिका के पृथक्करण' का निर्देश देता है?
(क) अनुच्छेद 45 (ख) अनुच्छेद 48 (ग) अनुच्छेद 50 (घ) अनुच्छेद 51
- ✔ उत्तर: (ग) अनुच्छेद 50 — अनुच्छेद 50 राज्य की लोक सेवाओं में कार्यपालिका से न्यायपालिका के पृथक्करण का स्पष्ट प्रावधान करता है।
- प्रश्न 14: निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा राज्य के नीति निदेशक तत्वों में नहीं जोड़ा गया था?
(क) अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता) (ख) अनुच्छेद 43A (उद्योगों के प्रबंधन में कर्मकारों की भागीदारी) (ग) अनुच्छेद 43B (सहकारी समितियों की प्रोन्नति) (घ) अनुच्छेद 48A (पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्धन)
- ✔ उत्तर: (ग) अनुच्छेद 43B (सहकारी समितियों की प्रोन्नति) — अनुच्छेद 43B को 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा जोड़ा गया था, 42वें संशोधन द्वारा नहीं।
- प्रश्न 15: राज्य के नीति निदेशक तत्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय हैं।
2. इनका उद्देश्य भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 (ख) केवल 2 (ग) 1 और 2 दोनों (घ) न तो 1 और न ही 2
- ✔ उत्तर: (ख) केवल 2 — अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निदेशक तत्व गैर-न्यायोचित (अदालत द्वारा अप्रवर्तनीय) हैं, अतः कथन 1 गलत और 2 सही है।
- प्रश्न 16: सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सही कूट चुनिए:
सूची-I: (A) अनुच्छेद 40, (B) अनुच्छेद 44, (C) अनुच्छेद 48, (D) अनुच्छेद 51
सूची-II: 1. समान नागरिक संहिता, 2. ग्राम पंचायतों का संगठन, 3. अंतरराष्ट्रीय शांति, 4. कृषि एवं पशुपालन
(क) A-2, B-1, C-4, D-3 (ख) A-1, B-2, C-3, D-4 (ग) A-2, B-4, C-1, D-3 (घ) A-4, B-1, C-2, D-3
- ✔ उत्तर: (क) A-2, B-1, C-4, D-3 — अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायत, अनुच्छेद 44 UCC, अनुच्छेद 48 कृषि व पशुपालन तथा अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति से संबंधित है।
- प्रश्न 17: संविधान का कौन-सा अनुच्छेद मादक पेयों और हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित है?
(क) अनुच्छेद 46 (ख) अनुच्छेद 47 (ग) अनुच्छेद 48 (घ) अनुच्छेद 49
- ✔ उत्तर: (ख) अनुच्छेद 47 — अनुच्छेद 47 पोषाहार स्तर, जीवन स्तर में सुधार तथा हानिकारक नशीले पेयों और औषधियों के निषेध का प्रावधान करता है।
📜 असली पिछले वर्ष के प्रश्न (BPSC)
- [BPSC 71वीं प्रारंभिक (13 सितंबर 2025), प्रश्न 59] निम्नलिखित में से कौन-सा नीति निर्देशक तत्त्व गांधीवादी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है ?
1) ग्राम पंचायतों का गठन
2) समान नागरिक संहिता
3) ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों की प्रोन्नति
4) काम का अधिकार
(क) 1 तथा 2 (ख) केवल 2 (ग) 2 और 4 (घ) 1 और 3
- ✔ आधिकारिक उत्तर: (ग) 2 और 4 — समान नागरिक संहिता (अनुच्छेद 44) एक उदार-बौद्धिक सिद्धांत है तथा काम का अधिकार (अनुच्छेद 41) एक समाजवादी सिद्धांत है, इसलिए ये दोनों गांधीवादी विचारधारा के अंतर्गत नहीं आते हैं।
परीक्षा में कैसे आता है
BPSC में नीति निदेशक तत्वों से संबंधित अनुच्छेदों का मिलान (Match the following), उनका वैचारिक वर्गीकरण (समाजवादी, गांधीवादी या उदार बौद्धिक) तथा 42वें एवं 44वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़े गए नए अनुच्छेदों पर लगातार सीधे और कूट-आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं।
इनमें भ्रम न करें
- ✘ अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता) 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया, जबकि अनुच्छेद 43B (सहकारी समितियां) 97वें संशोधन (2011) द्वारा जोड़ा गया।
- ✘ अनुच्छेद 45 अब 0-6 वर्ष तक के बच्चों की पूर्व-प्राथमिक शिक्षा से जुड़ा है, जबकि 6-14 वर्ष के बच्चों की अनिवार्य शिक्षा अनुच्छेद 21A (मौलिक अधिकार) में शामिल है।
💡 गांधीजी के 5 स्तम्भ याद रखें: 'पंचायत (40) में कुटीर उद्योग (43), SC/ST हित (46), शराबबंदी (47) और गो-रक्षा (48)'।
मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51क): 42वाँ एवं 86वाँ संविधान संशोधन
मूल संविधान में नागरिकों के लिए मौलिक कर्तव्यों का कोई उल्लेख नहीं था। वर्ष 1976 में आपातकाल के दौरान सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में भाग IV-क और अनुच्छेद 51क जोड़कर 10 मौलिक कर्तव्य शामिल किए गए। ये कर्तव्य पूर्व सोवियत संघ (USSR) के संविधान से प्रेरित हैं। इसके बाद 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा 11वाँ मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया, जिसके तहत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना माता-पिता या संरक्षक का कर्तव्य बनाया गया। नीति निदेशक तत्वों की तरह मौलिक कर्तव्य भी गैर-न्यायिक (अवादयोग्य) हैं, यानी इनके उल्लंघन पर न्यायालय सीधे दंड नहीं दे सकता, लेकिन संसद कानून बनाकर इनके क्रियान्वयन की व्यवस्था कर सकती है। यह केवल भारतीय नागरिकों पर लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं।
मुख्य तथ्य
- मौलिक कर्तव्य पूर्व सोवियत संघ (USSR) के संविधान से प्रेरित हैं।
- सरदार स्वर्ण सिंह समिति (1976) की सिफारिश पर संविधान में मौलिक कर्तव्य जोड़े गए।
- स्वर्ण सिंह समिति ने 8 मौलिक कर्तव्यों को शामिल करने की सिफारिश की थी।
- 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा भाग IV-क और अनुच्छेद 51क के तहत 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए।
- 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा 11वाँ मौलिक कर्तव्य [अनुच्छेद 51क (k)] जोड़ा गया।
- वर्तमान में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के तहत कुल 11 मौलिक कर्तव्य हैं।
- 11वाँ मौलिक कर्तव्य 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराने का दायित्व माता-पिता/संरक्षक पर डालता है।
- स्वर्ण सिंह समिति ने 'कर अदायगी' (Duty to pay taxes) को भी मौलिक कर्तव्य बनाने की सिफारिश की थी, जिसे स्वीकार नहीं किया गया।
- मौलिक कर्तव्यों के क्रियान्वयन और विधिक प्रावधानों के अध्ययन हेतु वर्ष 1999 में न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति गठित की गई थी।
- मौलिक कर्तव्य गैर-प्रवर्तनीय (गैर-न्यायिक) हैं और ये केवल भारतीय नागरिकों पर लागू होते हैं।
- अनुच्छेद 51क (g) में प्राकृतिक पर्यावरण (वन, झील, नदी और वन्यजीव) की रक्षा एवं संवर्धन का कर्तव्य शामिल है।
- अनुच्छेद 51क (h) में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना के विकास का उल्लेख है।
तालिका
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (a) · कर्तव्य का मुख्य विषय: संविधान का पालन, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (b) · कर्तव्य का मुख्य विषय: स्वतंत्रता संग्राम के उच्च आदर्शों को संजोना व पालन करना · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (c) · कर्तव्य का मुख्य विषय: भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (e) · कर्तव्य का मुख्य विषय: समरसता और भ्रातृत्व की भावना, स्त्रियों के सम्मान विरुद्ध प्रथाओं का त्याग · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (g) · कर्तव्य का मुख्य विषय: प्राकृतिक पर्यावरण (वन, झील, नदी, वन्यजीव) की रक्षा और संवर्धन · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (h) · कर्तव्य का मुख्य विषय: वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (i) · कर्तव्य का मुख्य विषय: सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना और हिंसा से दूर रहना · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (k) · कर्तव्य का मुख्य विषय: 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना (अभिभावक द्वारा) · जोड़ने वाला संशोधन: 86वाँ संशोधन, 2002
अभ्यास प्रश्न (हल सहित)
- प्रश्न 18: भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों को किस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा शामिल किया गया था?
(क) 44वाँ संशोधन (ख) 42वाँ संशोधन (ग) 86वाँ संशोधन (घ) 73वाँ संशोधन
- ✔ उत्तर: (ख) 42वाँ संशोधन — 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर संविधान में भाग IV-क और अनुच्छेद 51क जोड़कर 10 मौलिक कर्तव्य शामिल किए गए थे।
- प्रश्न 19: संविधान के 86वें संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा कौन-सा मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया था?
(क) प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण करना (ख) वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करना (ग) 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बालकों को शिक्षा का अवसर प्रदान करना (घ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना
- ✔ उत्तर: (ग) 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बालकों को शिक्षा का अवसर प्रदान करना — 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा अनुच्छेद 51क(k) जोड़कर 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के माता-पिता या अभिभावकों पर उन्हें शिक्षा दिलाने का दायित्व सौंपा गया।
- प्रश्न 20: मौलिक कर्तव्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल संविधान में 10 मौलिक कर्तव्य शामिल थे।
2. सरदार स्वर्ण सिंह समिति ने 8 मौलिक कर्तव्यों की अनुशंसा की थी।
3. मौलिक कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर लागू होते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 और 2 (ख) केवल 2 और 3 (ग) केवल 1 और 3 (घ) 1, 2 और 3
- ✔ उत्तर: (ख) केवल 2 और 3 — मूल संविधान में कोई मौलिक कर्तव्य नहीं था; इन्हें 1976 में जोड़ा गया, जबकि स्वर्ण सिंह समिति ने 8 कर्तव्यों की सिफारिश की थी और ये केवल नागरिकों पर लागू होते हैं।
- प्रश्न 21: निम्नलिखित में से कौन-सी समिति मौलिक कर्तव्यों के क्रियान्वयन हेतु कानूनी प्रावधानों की पहचान से संबंधित थी?
(क) सरकारिया आयोग (ख) वर्मा समिति (ग) केलकर समिति (घ) संथानम समिति
- ✔ उत्तर: (ख) वर्मा समिति — न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (1999) ने मौलिक कर्तव्यों के क्रियान्वयन के लिए विद्यमान विधिक प्रावधानों की पहचान की थी।
- प्रश्न 22: निम्नलिखित में से कौन-सा एक भारत के संविधान में उल्लिखित मौलिक कर्तव्य नहीं है?
(क) संविधान का पालन करना तथा राष्ट्रध्वज का आदर करना (ख) मतदान करना और चुनावों में भाग लेना (ग) सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा से दूर रहना (घ) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करना
- ✔ उत्तर: (ख) मतदान करना और चुनावों में भाग लेना — मतदान करना (Voting) कोई मौलिक कर्तव्य नहीं है; स्वर्ण सिंह समिति द्वारा कर भुगतान की तरह मतदान के कर्तव्य को भी संविधान में शामिल नहीं किया गया था।
- प्रश्न 23: सरदार स्वर्ण सिंह समिति ने निम्नलिखित में से किस प्रावधान को मौलिक कर्तव्य में शामिल करने का सुझाव दिया था जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया?
(क) राष्ट्रगान का सम्मान (ख) कर अदायगी (Tax payment) (ग) वैज्ञानिक दृष्टिकोण (घ) पर्यावरण संरक्षण
- ✔ उत्तर: (ख) कर अदायगी (Tax payment) — स्वर्ण सिंह समिति ने 'कर अदायगी' और 'कर्तव्यों के उल्लंघन पर दंड' की सिफारिश की थी, जिसे 42वें संशोधन में शामिल नहीं किया गया था।
परीक्षा में कैसे आता है
BPSC CCE और बिहार दरोगा में इस उप-विषय से प्रायः सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं—जैसे समिति का नाम (स्वर्ण सिंह समिति), स्रोत देश (USSR), संविधान संशोधन संख्या (42वाँ और 86वाँ), कुल कर्तव्यों की संख्या (11), तथा 'निम्न में से कौन-सा मौलिक कर्तव्य नहीं है' प्रकार के प्रश्न।
इनमें भ्रम न करें
- ✘ 42वें संशोधन (1976) द्वारा 10 कर्तव्य जोड़े गए थे, 11 नहीं। 11वाँ कर्तव्य 86वें संशोधन (2002) द्वारा जुड़ा।
- ✘ स्वर्ण सिंह समिति ने 8 कर्तव्यों की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार ने 10 कर्तव्य जोड़े थे।
- ✘ पर्यावरण संरक्षण अनुच्छेद 48क (DPSP - राज्य का कर्तव्य) और अनुच्छेद 51क(g) (मौलिक कर्तव्य - नागरिक का कर्तव्य) दोनों में मौजूद है; दोनों के शब्दों का अंतर ध्यान रखें।
💡 'सोवियत से स्वर्ण लेकर 42वें में 10 जोड़े, 86वें में 11वाँ शिक्षा कर्तव्य बनाया।' (USSR -> स्वर्ण सिंह -> 42वाँ संशोधन = 10 कर्तव्य; 86वाँ = 11वाँ शिक्षा कर्तव्य)
महत्वपूर्ण वाद (केशवानंद भारती, मेनका गांधी, मिनर्वा मिल्स आदि)
भारतीय संविधान के विकास में न्यायपालिका और संसद के बीच अधिकारों के संतुलन को लेकर कई ऐतिहासिक वाद हुए। प्रारंभिक दौर में शंकरी प्रसाद वाद (1951) में संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन की असीमित शक्ति मानी गई, किंतु गोलकनाथ वाद (1967) में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की मौलिक अधिकारों में कटौती की शक्ति पर रोक लगा दी। इसके समाधान हेतु केशवानंद भारती वाद (1973) में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 'मूल संरचना का सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) प्रतिपादित किया, जिसके तहत संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है किंतु उसके आधारभूत ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती। मेनका गांधी वाद (1978) ने अनुच्छेद 21 का विस्तार करते हुए 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' की संकीर्ण व्याख्या को समाप्त कर प्राकृतिक न्याय और 'विधि की सम्यक प्रक्रिया' (Due Process of Law) को अपनाया। मिनर्वा मिल्स वाद (1980) ने स्थापित किया कि भारतीय संविधान मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन पर आधारित है तथा न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना है।
मुख्य तथ्य
- शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951) में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रथम संविधान संशोधन को वैध ठहराते हुए कहा कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है।
- ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की संकीर्ण व्याख्या की और 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' को कठोरता से लागू माना।
- गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) में 11 न्यायाधीशों की पीठ ने 6-5 के बहुमत से निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों को छीन या कम नहीं कर सकती।
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले का ऐतिहासिक फैसला 24 अप्रैल 1973 को 13 न्यायाधीशों की अब तक की सबसे बड़ी संविधान पीठ द्वारा 7-6 के बहुमत से सुनाया गया।
- केशवानंद भारती वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) का सिद्धांत प्रतिपादित किया।
- इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राजनारायण (1975) में न्यायालय ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा न्यायिक समीक्षा को मूल संरचना घोषित किया।
- ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) को 'बंदी प्रत्यक्षीकरण वाद' कहा जाता है, जिसमें आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 21 के निलंबन को बरकरार रखा गया था (जिसे बाद में गलत माना गया)।
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) वाद में विदेश जाने के अधिकार को अनुच्छेद 21 का अंग माना गया तथा 'विधि की उचित/सम्यक प्रक्रिया' की संकल्पना स्थापित हुई।
- मेनका गांधी वाद में ही अनुच्छेद 14, 19 और 21 के अंतर्संबंध को 'स्वर्णिम त्रिकोण' (Golden Triangle) का नाम दिया गया।
- मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) में न्यायालय ने 42वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 368(4) और 368(5) को असंवैधानिक घोषित कर संसद की असीमित संशोधन शक्ति को रद्द कर दिया।
- मिनर्वा मिल्स मामले में न्यायालय ने कहा कि संविधान मौलिक अधिकार (भाग III) और नीति निदेशक तत्व (भाग IV) के बीच संतुलन की नींव पर टिका है।
- एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि पंथनिरपेक्षता (Secularism) संविधान की मूल संरचना है और अनुच्छेद 356 की न्यायिक समीक्षा संभव है।
- आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) में फैसला दिया गया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद 9वीं अनुसूची में शामिल सभी कानूनों की न्यायिक समीक्षा मूल संरचना के आधार पर हो सकती है।
- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) वाद (2002) में मतदाताओं के उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति आदि जानने के अधिकार को अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत मौलिक अधिकार माना गया।
तालिका
- प्रमुख वाद: शंकरी प्रसाद वाद · वर्ष: 1951 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है।
- प्रमुख वाद: ए.के. गोपालन वाद · वर्ष: 1950 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: अनुच्छेद 21 की संकीर्ण व्याख्या; केवल कार्यपालिका की मनमानी के विरुद्ध संरक्षण।
- प्रमुख वाद: गोलकनाथ वाद · वर्ष: 1967 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: संसद भाग-III (मौलिक अधिकारों) में कोई कटौती या संशोधन नहीं कर सकती।
- प्रमुख वाद: केशवानंद भारती वाद · वर्ष: 1973 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: संविधान के 'आधारभूत ढांचे' (Basic Structure) का सिद्धांत; 24 अप्रैल 1973।
- प्रमुख वाद: इंदिरा नेहरू गांधी वाद · वर्ष: 1975 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव और न्यायिक समीक्षा को मूल संरचना माना गया।
- प्रमुख वाद: ए.डी.एम. जबलपुर वाद · वर्ष: 1976 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: आपातकाल में अनुच्छेद 21 का निलंबन मान्य माना गया (बंदी प्रत्यक्षीकरण वाद)।
- प्रमुख वाद: मेनका गांधी वाद · वर्ष: 1978 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: अनुच्छेद 21 में विधि की उचित प्रक्रिया, विदेश गमन का अधिकार, स्वर्णिम त्रिकोण।
- प्रमुख वाद: मिनर्वा मिल्स वाद · वर्ष: 1980 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: मौलिक अधिकार एवं DPSP में संतुलन; संसद की संशोधन शक्ति सीमित है।
- प्रमुख वाद: एस.आर. बोम्मई वाद · वर्ष: 1994 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: अनुच्छेद 356 की न्यायिक समीक्षा तथा पंथनिरपेक्षता को मूल ढांचा घोषित किया गया।
- प्रमुख वाद: आई.आर. कोएल्हो वाद · वर्ष: 2007 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की भी न्यायिक समीक्षा संभव।
अभ्यास प्रश्न (हल सहित)
- प्रश्न 24: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान के 'आधारभूत ढांचे' (मूल संरचना) का सिद्धांत किस ऐतिहासिक वाद में प्रतिपादित किया गया था?
(क) गोलकनाथ वाद (1967) (ख) केशवानंद भारती वाद (1973) (ग) मिनर्वा मिल्स वाद (1980) (घ) शंकरी प्रसाद वाद (1951)
- ✔ उत्तर: (ख) केशवानंद भारती वाद (1973) — केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (24 अप्रैल 1973) में 13 जजों की पीठ ने संविधान के 'मूल संरचना' के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।
- प्रश्न 25: निम्नलिखित में से किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि 'संविधान मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन की आधारशिला पर निर्मित है'?
(क) मेनका गांधी वाद (ख) ए.डी.एम. जबलपुर वाद (ग) मिनर्वा मिल्स वाद (घ) इंदिरा साहनी वाद
- ✔ उत्तर: (ग) मिनर्वा मिल्स वाद — मिनर्वा मिल्स वाद (1980) में न्यायालय ने मौलिक अधिकारों और DPSP के मध्य संतुलन को संविधान की मूल विशेषता बताया।
- प्रश्न 26: विदेश यात्रा के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत दैहिक स्वतंत्रता का भाग किस वाद में घोषित किया गया?
(क) ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (ख) मेनका गांधी बनाम भारत संघ (ग) आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (घ) एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ
- ✔ उत्तर: (ख) मेनका गांधी बनाम भारत संघ — मेनका गांधी वाद (1978) में पासपोर्ट जब्त करने के मामले में न्यायालय ने विदेश यात्रा के अधिकार को अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग माना।
- प्रश्न 27: आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) वाद मुख्य रूप से संविधान की किस अनुसूची की न्यायिक समीक्षा से संबंधित है?
(क) सातवीं अनुसूची (ख) आठवीं अनुसूची (ग) नौवीं अनुसूची (घ) दसवीं अनुसूची
- ✔ उत्तर: (ग) नौवीं अनुसूची — कोएल्हो वाद (2007) में निर्धारित हुआ कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की मूल संरचना के उल्लंघन पर न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
- प्रश्न 28: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गोलकनाथ वाद (1967) में संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने से रोक दिया गया था।
2. केशवानंद भारती पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सीकरी ने की थी।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 (ख) केवल 2 (ग) 1 और 2 दोनों (घ) न तो 1 और न ही 2
- ✔ उत्तर: (ग) 1 और 2 दोनों — गोलकनाथ वाद में मौलिक अधिकारों में संशोधन पर रोक लगी तथा केशवानंद भारती पीठ के मुख्य न्यायाधीश सर्व मित्र सीकरी (S.M. Sikri) थे।
- प्रश्न 29: सर्वोच्च न्यायालय ने किस वाद में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) लगाने की प्रक्रिया को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना तथा धर्मनिरपेक्षता को मूल ढांचा बताया?
(क) एस.आर. बोम्मई वाद (1994) (ख) राजनारायण वाद (1975) (ग) ए.डी.एम. जबलपुर वाद (1976) (घ) शंकरी प्रसाद वाद (1951)
- ✔ उत्तर: (क) एस.आर. बोम्मई वाद (1994) — एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में अनुच्छेद 356 की न्यायिक समीक्षा और पंथनिरपेक्षता को मूल संरचना का भाग माना गया।
परीक्षा में कैसे आता है
BPSC में ऐतिहासिक वादों से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं; जैसे मूल संरचना का सिद्धांत किस वाद से आया, विदेश यात्रा का अधिकार किस वाद से जुड़ा है, अथवा नौवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा की कट-ऑफ तारीख (24 अप्रैल 1973) क्या है। मिलान करने वाले और कथन-आधारित प्रश्नों का चलन बढ़ा है।
इनमें भ्रम न करें
- ✘ गोलकनाथ (1967) बनाम केशवानंद भारती (1973): गोलकनाथ में न्यायालय ने कहा कि संसद मौलिक अधिकार घटा ही नहीं सकती, जबकि केशवानंद में कहा कि संसद संशोधन तो कर सकती है पर 'मूल ढांचे' को छू नहीं सकती।
- ✘ ए.के. गोपालन (1950) बनाम मेनका गांधी (1978): गोपालन वाद में अनुच्छेद 21 के तहत केवल 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' की संकीर्ण व्याख्या थी, जबकि मेनका गांधी वाद में इसे अमेरिकी अवधारणा 'विधि की सम्यक प्रक्रिया' (न्यायपूर्ण, उचित और निष्पक्ष) के रूप में विस्तृत किया गया।
- ✘ 42वां संविधान संशोधन (1976) बनाम मिनर्वा मिल्स (1980): 42वें संशोधन ने संसद की संविधान संशोधन शक्ति को असीमित कर दिया था, जिसे मिनर्वा मिल्स वाद में असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किया गया।
💡 याद रखें कालक्रम: 'शंकरी ने बोला (गोलक) -> केशव ने ढांचा बनाया -> मेनका विदेश गई -> मिनर्वा ने संतुलन बनाया' (1951 -> 1967 -> 1973 -> 1978 -> 1980)
एक नज़र में (Revision)
- मौलिक अधिकार संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12 से 35) में वर्णित हैं और इन्हें अमेरिका के संविधान से लिया गया है।
- मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे, परंतु 44वें संशोधन 1978 द्वारा संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 31) को हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया।
- वर्तमान में 6 मौलिक अधिकार हैं: समता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति व शिक्षा का अधिकार, और संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
- अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय 5 प्रकार की रिटें (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार-पृच्छा) जारी कर सकते हैं।
- नीति निदेशक तत्व (DPSP) भाग IV (अनुच्छेद 36 से 51) में आयरलैंड के संविधान से प्रेरित होकर शामिल किए गए हैं।
- DPSP गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं और इन्हें तीन श्रेणियों में बांटा जाता है: समाजवादी, गांधीवादी और उदार-बौद्धिक सिद्धांत।
- मौलिक कर्तव्य संविधान के भाग IV-A (अनुच्छेद 51A) में स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संशोधन 1976 द्वारा जोड़े गए।
- मूल रूप से 10 मौलिक कर्तव्य थे, परंतु 86वें संशोधन 2002 द्वारा 11वां मौलिक कर्तव्य (6-14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा) जोड़ा गया।
- केशवानंद भारती मामला (1973) ने 'मूल ढांचे के सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) की स्थापना की।
- मेनका गांधी मामला (1978) ने अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या कर 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' को 'विधि की सम्यक प्रक्रिया' से जोड़ा।
- मिनर्वा मिल्स मामला (1980) ने स्थापित किया कि मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं तथा संविधान इनके संतुलन पर टिका है।
अपने आप को जाँचिए — 10 प्रश्न
1. मौलिक अधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्राप्त स्वतंत्रताएं केवल भारतीय नागरिकों को उपलब्ध हैं। 2. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है। उपयुक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- (क) केवल 1
- (ख) केवल 2
- (ग) 1 और 2 दोनों
- (घ) न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें
उत्तर: (ग) 1 और 2 दोनों
अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त हैं, तथा 44वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 20 और 21 आपातकाल में भी निलंबित नहीं होते हैं।
2. सुमेलित कीजिए: (a) बंदी प्रत्यक्षीकरण - 1. हम आदेश देते हैं, (b) परमादेश - 2. आपको शरीर प्रस्तुत करना होगा, (c) अधिकार-पृच्छा - 3. किस प्राधिकार या वारंट से। सही कूट चुनिए:
- (क) a-2, b-1, c-3
- (ख) a-1, b-2, c-3
- (ग) a-3, b-1, c-2
- (घ) a-2, b-3, c-1
उत्तर देखें
उत्तर: (क) a-2, b-1, c-3
बंदी प्रत्यक्षीकरण का शाब्दिक अर्थ 'शरीर प्रस्तुत करना', परमादेश का 'हम आदेश देते हैं' और अधिकार-पृच्छा का अर्थ 'किस प्राधिकार से' होता है।
3. निम्नलिखित में से कौन सा अनुच्छेद राज्य के नीति निदेशक तत्वों में गांधीवादी सिद्धांत पर आधारित है?
- (क) अनुच्छेद 39A - समान न्याय और नि:शुल्क कानूनी सहायता
- (ख) अनुच्छेद 40 - ग्राम पंचायतों का संगठन
- (ग) अनुच्छेद 44 - समान नागरिक संहिता
- (घ) अनुच्छेद 50 - न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण
उत्तर देखें
उत्तर: (ख) अनुच्छेद 40 - ग्राम पंचायतों का संगठन
अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों का गठन) महात्मा गांधी के स्वशासन के सपने पर आधारित गांधीवादी सिद्धांत है।
4. भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के संवर्धन से संबंधित है?
- (क) अनुच्छेद 48A
- (ख) अनुच्छेद 49
- (ग) अनुच्छेद 50
- (घ) अनुच्छेद 51
उत्तर देखें
उत्तर: (घ) अनुच्छेद 51
अनुच्छेद 51 राज्य को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने का निर्देश देता है, जो उदार-बौद्धिक सिद्धांत का हिस्सा है।
5. मौलिक कर्तव्यों के संदर्भ में, 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा कौन सा कर्तव्य जोड़ा गया था?
- (क) वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन का विकास करना
- (ख) सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना
- (ग) 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करना
- (घ) पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करना
उत्तर देखें
उत्तर: (ग) 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करना
86वें संशोधन 2002 द्वारा अनुच्छेद 51A में (k) अंतःस्थापित करके 11वां मौलिक कर्तव्य (6 से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के शिक्षा का अवसर प्रदान करना) जोड़ा गया।
6. भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों को किस समिति की सिफारिशों के आधार पर शामिल किया गया था?
- (क) वर्मा समिति
- (ख) स्वर्ण सिंह समिति
- (ग) सरकारिया आयोग
- (घ) बलवंत राय मेहता समिति
उत्तर देखें
उत्तर: (ख) स्वर्ण सिंह समिति
42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा मौलिक कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर संविधान के भाग IV-A में जोड़ा गया।
7. संसद द्वारा संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की शक्ति पर 'मूल ढांचे का सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) किस प्रसिद्ध मामले में दिया गया था?
- (क) गोलकनाथ मामला (1967)
- (ख) केशवानंद भारती मामला (1973)
- (ग) मिनर्वा मिल्स मामला (1980)
- (घ) ए. के. गोपालन मामला (1950)
उत्तर देखें
उत्तर: (ख) केशवानंद भारती मामला (1973)
1973 के केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 'मूल ढांचे का सिद्धांत' प्रतिपादित किया।
8. अनुच्छेद 21 में उल्लिखित 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' की व्याख्या करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने किस मामले में 'विधि की सम्यक प्रक्रिया' (Due Process of Law) का सिद्धांत समाविष्ट किया?
- (क) मेनका गांधी मामला (1978)
- (ख) केशवानंद भारती मामला (1973)
- (ग) शाह बानो मामला (1985)
- (घ) इंद्रा साहनी मामला (1992)
उत्तर देखें
उत्तर: (क) मेनका गांधी मामला (1978)
मेनका गांधी मामले (1978) में न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 21 के तहत प्रक्रिया न केवल कानूनन सही होनी चाहिए बल्कि वह न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत भी होनी चाहिए।
9. किस ऐतिहासिक वाद में यह निर्णय दिया गया कि मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और संविधान इन दोनों के संतुलन पर आधारित है?
- (क) शंकरी प्रसाद मामला
- (ख) सज्जन सिंह मामला
- (ग) मिनर्वा मिल्स मामला
- (घ) बेरुबारी यूनियन मामला
उत्तर देखें
उत्तर: (ग) मिनर्वा मिल्स मामला
मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भाग III और भाग IV के बीच संतुलन संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।
10. किसी निचले न्यायालय या न्यायाधिकरण को अपनी अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का उल्लंघन करने से रोकने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा कौन सी रिट जारी की जाती है?
- (क) प्रतिषेध (Prohibition)
- (ख) उत्प्रेषण (Certiorari)
- (ग) अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto)
- (घ) परमादेश (Mandamus)
उत्तर देखें
उत्तर: (क) प्रतिषेध (Prohibition)
प्रतिषेध (Prohibition) रिट का अर्थ 'रोकना' है और यह केवल न्यायिक या अर्ध-न्यायिक निकायों के खिलाफ तब जारी की जाती है जब कार्यवाही जारी हो और क्षेत्राधिकार का उल्लंघन हो रहा हो।
English version — Fundamental Rights, Directive Principles of State Policy, and Fundamental Duties
This chapter is extremely vital for both BPSC Prelims and Mains examinations. Direct objective questions are asked on articles, writs, and constitutional amendments in Prelims, while Mains focuses on the analytical relationship between Fundamental Rights and DPSPs.
Fundamental Rights: Articles 12-35 and Six Rights
Part III of the Indian Constitution, spanning Articles 12 to 35, enshrines the Fundamental Rights, famously referred to as the 'Magna Carta of India'. Inspired by the US Bill of Rights, these rights protect citizens against arbitrary state action and foster political democracy. Originally, the Constitution provided seven fundamental rights, but the 44th Constitutional Amendment Act of 1978 removed the Right to Property (Article 31) from Part III, reclassifying it as a legal right under Article 300A in Part XII. Currently, there are six fundamental rights available to citizens. These rights are not absolute but qualified, meaning the State can impose reasonable restrictions on grounds such as public order, morality, and national sovereignty.
Key facts
- Fundamental Rights are enshrined in Part III and Articles 12 to 35 of the Indian Constitution.
- Part III of the Constitution is described as the 'Magna Carta of India'.
- Originally there were 7 Fundamental Rights, but the Right to Property was removed by the 44th Amendment Act, 1978.
- At present, the Right to Property is merely a legal or constitutional right under Article 300A.
- Article 12 provides the definition of the 'State' for the purpose of Fundamental Rights.
- Article 13 declares that laws inconsistent with or in derogation of Fundamental Rights shall be void (basis of Judicial Review).
- Article 14 confers Equality before Law (from Britain) and Equal Protection of the Laws (from the USA).
- Article 15 prohibits discrimination on grounds of religion, race, caste, sex, or place of birth.
- Article 17 abolishes untouchability and forbids its practice in any form as a punishable offence.
- Article 19(1) guarantees 6 democratic freedoms (speech, assembly, association, movement, residence, profession) to citizens.
- Article 21A was added by the 86th Constitutional Amendment 2002, guaranteeing free and compulsory education for children aged 6-14.
- Articles 20 and 21 cannot be suspended even during a National Emergency under Article 352.
- Articles 15, 16, 19, 29, and 30 are exclusively available to Indian citizens and not to foreigners.
- Article 23 prohibits human trafficking and forced labour, while Article 24 bans child labour below 14 years in hazardous industries.
- Dr. B.R. Ambedkar called Article 32 (Right to Constitutional Remedies) the 'Heart and Soul of the Constitution'.
Table
- क्रम: 1 · मौलिक अधिकार का नाम: समानता का अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 14 - 18 · मुख्य विषय: विधि के समक्ष समता, भेदभाव की समाप्ति, अवसर की समता, अस्पृश्यता व उपाधियों का अंत
- क्रम: 2 · मौलिक अधिकार का नाम: स्वतंत्रता का अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 19 - 22 · मुख्य विषय: 6 लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं, अपराधों की दोषसिद्धि में संरक्षण, जीवन का अधिकार (21), शिक्षा का अधिकार (21A)
- क्रम: 3 · मौलिक अधिकार का नाम: शोषण के विरुद्ध अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 23 - 24 · मुख्य विषय: मानव दुर्व्यापार व जबरन श्रम पर रोक (23), कारखानों में बालश्रम पर रोक (24)
- क्रम: 4 · मौलिक अधिकार का नाम: धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 25 - 28 · मुख्य विषय: अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म प्रचार, धार्मिक मामलों का प्रबंधन और धार्मिक करों से छूट
- क्रम: 5 · मौलिक अधिकार का नाम: संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 29 - 30 · मुख्य विषय: अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण और उन्हें शिक्षण संस्थान स्थापित करने व चलाने का अधिकार
- क्रम: 6 · मौलिक अधिकार का नाम: संवैधानिक उपचारों का अधिकार · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 32 · मुख्य विषय: मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सर्वोच्च न्यायालय जाने और 5 प्रकार की रिट जारी कराने का अधिकार
Practice questions (solved)
- Q 1: भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है और किसी भी रूप में इसका आचरण निषिद्ध है?
(क) अनुच्छेद 14 (ख) अनुच्छेद 17 (ग) अनुच्छेद 18 (घ) अनुच्छेद 19
- ✔ Answer: (ख) अनुच्छेद 17 — अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का पूर्ण अंत करता है और इसका किसी भी रूप में आचरण विधि के अनुसार दंडनीय अपराध घोषित करता है।
- Q 2: निम्नलिखित में से कौन-सा मौलिक अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है, विदेशियों को नहीं?
(क) विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 14) (ख) प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21) (ग) लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता (अनुच्छेद 16) (घ) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25)
- ✔ Answer: (ग) लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता (अनुच्छेद 16) — अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 और 30 केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त अधिकार हैं।
- Q 3: 44वें संविधान संशोधन अधिनियम (1978) द्वारा किस मौलिक अधिकार को समाप्त कर एक कानूनी अधिकार बना दिया गया?
(क) समानता का अधिकार (ख) शोषण के विरुद्ध अधिकार (ग) संपत्ति का अधिकार (घ) सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार
- ✔ Answer: (ग) संपत्ति का अधिकार — 44वें संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 31) को मौलिक अधिकार से हटाकर अनुच्छेद 300A के तहत कानूनी अधिकार बनाया गया।
- Q 4: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के लागू रहने पर भी राष्ट्रपति द्वारा किन मौलिक अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता?
(क) अनुच्छेद 14 और 19 (ख) अनुच्छेद 19 और 20 (ग) अनुच्छेद 20 और 21 (घ) अनुच्छेद 21 और 22
- ✔ Answer: (ग) अनुच्छेद 20 और 21 — 44वें संविधान संशोधन 1978 के अनुसार आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 और 21 के अधिकारों का निलंबन नहीं किया जा सकता।
- Q 5: मौलिक अधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौलिक अधिकार असीमित और पूर्णतः निरपेक्ष हैं।
2. 86वें संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा अनुच्छेद 21A को जोड़ा गया।
3. डॉ. आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को 'संविधान की आत्मा' कहा था।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 और 2 (ख) केवल 2 और 3 (ग) केवल 1 और 3 (घ) 1, 2 और 3
- ✔ Answer: (ख) केवल 2 और 3 — मौलिक अधिकार निरपेक्ष (absolute) नहीं हैं, बल्कि इन पर राज्य द्वारा युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं, इसलिए कथन 1 गलत है।
- Q 6: भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद बालश्रम (14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के कारखानों में नियोजन) को पूर्णतः प्रतिषिद्ध करता है?
(क) अनुच्छेद 23 (ख) अनुच्छेद 24 (ग) अनुच्छेद 21A (घ) अनुच्छेद 25
- ✔ Answer: (ख) अनुच्छेद 24 — अनुच्छेद 24 जोखिम भरे उद्योगों और कारखानों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन का प्रतिषेध करता है (जबकि अनु. 23 मानव दुर्व्यापार पर रोक लगाता है)।
📜 Real previous-year questions (BPSC)
- [BPSC 71वीं प्रारंभिक (13 सितंबर 2025), प्रश्न 63] भारतीय संविधान मौलिक अधिकारों पर औचित्यपूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान करता है किन्तु औचित्य को ध्यान में रखना चाहिए कि :
1) सामान्य जन का हित संरक्षित हो
2) विद्यमान सामाजिक मूल्य एवं सामाजिक आवश्यकताएं अवरोध न हो।
3) राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को नजर अंदाज किया जा सकता है।
4) सामूहिक हित बृहत्तर नही है।
इनमें से :
(क) 1 और 2 सही है (ख) 2 और 3 सही है (ग) केवल 4 सही है (घ) केवल 1 सही है
- ✔ Official answer: (क) 1 और 2 सही है — मौलिक अधिकार असीमित नहीं हैं। उन पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाते समय जनहित का संरक्षण होना चाहिए तथा समाज के स्थापित नैतिक मूल्यों एवं अनिवार्य आवश्यकताओं में अवांछित बाधा नहीं आनी चाहिए।
How it is asked
BPSC CCE and Bihar SI consistently ask 1-3 direct or statement-based questions on Fundamental Rights. Recurring patterns include article-matching (e.g., Art 17, 21, 24), rights available solely to citizens (15, 16, 19, 29, 30), non-suspendable rights during emergency (20 & 21), and constitutional amendments (44th and 86th).
Do not confuse
- ✘ अनुच्छेद 23 और अनुच्छेद 24 में भ्रम: अनुच्छेद 23 मानव तस्करी, बेगार व बंधुआ मजदूरी पर रोक लगाता है, जबकि अनुच्छेद 24 कारखानों में 14 वर्ष से कम उम्र के बालश्रम पर रोक लगाता है।
- ✘ मौलिक अधिकार और कानूनी अधिकार में अंतर: संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है; 44वें संशोधन 1978 के बाद यह भाग-12 के अनुच्छेद 300A के अंतर्गत केवल एक वैधानिक/कानूनी अधिकार है।
- ✘ सभी व्यक्ति बनाम केवल नागरिक: अनुच्छेद 14, 20, 21, 21A, 22, 23, 24, 25, 26, 27, 28 सभी व्यक्तियों (विदेशियों सहित) को प्राप्त हैं, जबकि 15, 16, 19, 29, 30 केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं।
💡 याद रखें ट्रिक: 'समस्त शोध संस्कृति के उपचार' (सम = समानता 14-18, स्त = स्वतंत्रता 19-22, शो = शोषण के विरुद्ध 23-24, ध = धार्मिक स्वतंत्रता 25-28, संस्कृति = सांस्कृतिक व शैक्षिक 29-30, उपचार = संवैधानिक उपचार 32)।
Writs (Constitutional Remedies)
The Indian Constitution empowers the judiciary to issue extraordinary orders known as writs to enforce and protect Fundamental Rights. Dr. B.R. Ambedkar described Article 32 as the 'Heart and Soul of the Constitution' because rights are meaningless without a judicial remedy. Under Article 32, the Supreme Court can issue five types of writs solely for the enforcement of Fundamental Rights. Under Article 226, High Courts possess a broader writ jurisdiction that covers Fundamental Rights as well as ordinary legal rights. The five writs are Habeas Corpus, Mandamus, Prohibition, Certiorari, and Quo-Warranto, which have their origin in British common law prerogative writs.
Key facts
- The Supreme Court under Article 32 and High Courts under Article 226 can issue writs.
- Dr. B.R. Ambedkar called Article 32 the 'heart and soul of the Constitution'.
- The Indian Constitution provides for five types of writs: Habeas Corpus, Mandamus, Prohibition, Certiorari, and Quo-Warranto.
- The writ jurisdiction of the High Court (Article 226) is wider than that of the Supreme Court (Article 32).
- Habeas Corpus literally means 'to have the body of'.
- The writ of Habeas Corpus can be issued against both public authorities and private individuals.
- Mandamus literally translates to 'We Command'.
- Mandamus cannot be issued against a private individual, the President of India, or a State Governor.
- Prohibition literally means 'to forbid' and is issued only against judicial and quasi-judicial bodies.
- Certiorari literally means 'to be certified' or 'to be informed'.
- Prohibition is only preventive, whereas Certiorari is both preventive and curative.
- Quo-Warranto literally means 'by what authority or warrant'.
- Quo-Warranto is issued only to review the legality of a claim to a public office, not for private offices.
- Parliament can empower any other subordinate court to issue writs under Article 32(3) by law.
Table
- रिट का नाम: बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) · शाब्दिक अर्थ: सशरीर प्रस्तुत किया जाए · किसके विरुद्ध जारी होती है?: सार्वजनिक एवं निजी दोनों निकाय · प्रमुख उद्देश्य: अवैध रूप से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को रिहा कराना
- रिट का नाम: परमादेश (Mandamus) · शाब्दिक अर्थ: हम आदेश देते हैं · किसके विरुद्ध जारी होती है?: केवल सार्वजनिक अधिकारी, अधीनस्थ न्यायालय, सरकार · प्रमुख उद्देश्य: सार्वजनिक या विधिक कर्तव्य के पालन हेतु बाध्य करना
- रिट का नाम: प्रतिषेध (Prohibition) · शाब्दिक अर्थ: मना करना / रोकना · किसके विरुद्ध जारी होती है?: न्यायिक एवं अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकरण · प्रमुख उद्देश्य: अधीनस्थ न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करने से रोकना (निवारक)
- रिट का नाम: उत्प्रेषण (Certiorari) · शाब्दिक अर्थ: प्रमाणित होना / पूर्णतः सूचित होना · किसके विरुद्ध जारी होती है?: न्यायिक, अर्द्ध-न्यायिक एवं प्रशासनिक प्राधिकरण · प्रमुख उद्देश्य: अधिकार क्षेत्र की त्रुटि या प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर निर्णय को रद्द करना (उपचारात्मक)
- रिट का नाम: अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) · शाब्दिक अर्थ: किस अधिकार या वारंट से · किसके विरुद्ध जारी होती है?: सार्वजनिक कार्यालय धारक व्यक्ति · प्रमुख उद्देश्य: किसी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक पद के अवैध अनाधिकार ग्रहण को रोकना
Practice questions (solved)
- Q 7: संविधान के किस अनुच्छेद को डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने 'संविधान की आत्मा और हृदय' कहा था?
(क) अनुच्छेद 14 (ख) अनुच्छेद 19 (ग) अनुच्छेद 21 (घ) अनुच्छेद 32
- ✔ Answer: (घ) अनुच्छेद 32 — डॉ. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) को संविधान का हृदय और आत्मा कहा था क्योंकि यह मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराता है।
- Q 8: निम्नलिखित में से कौन-सी रिट सार्वजनिक और निजी दोनों व्यक्तियों के विरुद्ध जारी की जा सकती है?
(क) परमादेश (ख) बंदी प्रत्यक्षीकरण (ग) प्रतिषेध (घ) अधिकार-पृच्छा
- ✔ Answer: (ख) बंदी प्रत्यक्षीकरण — बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) एकमात्र ऐसी रिट है जो राज्य के अधिकारियों तथा निजी व्यक्तियों दोनों के विरुद्ध अवैध निरोध के मामले में जारी हो सकती है।
- Q 9: उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार के संबंध में कौन-सा कथन सत्य है?
(क) उच्चतम न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्च न्यायालय से व्यापक है। (ख) उच्च न्यायालय केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी कर सकता है। (ग) उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय से अधिक व्यापक है। (घ) अनुच्छेद 32 के तहत उच्च न्यायालय रिट जारी करता है।
- ✔ Answer: (ग) उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय से अधिक व्यापक है। — अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के अलावा अन्य विधिक अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है, अतः इसका क्षेत्राधिकार व्यापक है।
- Q 10: 'हम आदेश देते हैं' (We Command) किस रिट का शाब्दिक अर्थ है?
(क) बंदी प्रत्यक्षीकरण (ख) परमादेश (ग) उत्प्रेषण (घ) अधिकार-पृच्छा
- ✔ Answer: (ख) परमादेश — परमादेश (Mandamus) लैटिन शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ 'हम आदेश देते हैं' होता है, जो सार्वजनिक कर्तव्य के पालन हेतु दिया जाता है।
- Q 11: अवैध रूप से किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को उस पद से हटाने हेतु न्यायालय कौन-सी रिट जारी करता है?
(क) अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) (ख) प्रतिषेध (Prohibition) (ग) उत्प्रेषण (Certiorari) (घ) बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
- ✔ Answer: (क) अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) — अधिकार-पृच्छा रिट तब जारी की जाती है जब किसी व्यक्ति द्वारा किसी सार्वजनिक पद को अवैध रूप से धारण किया गया हो।
- Q 12: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रतिषेध रिट वरिष्ठ न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकने हेतु जारी की जाती है।
2. उत्प्रेषण रिट केवल निवारक (preventive) प्रकृति की होती है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 (ख) केवल 2 (ग) 1 और 2 दोनों (घ) न तो 1 और न ही 2
- ✔ Answer: (क) केवल 1 — कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है क्योंकि उत्प्रेषण निवारक के साथ-साथ उपचारात्मक (curative) भी होती है, जबकि प्रतिषेध केवल निवारक होती है।
How it is asked
In BPSC exams, questions are frequently asked on the literal Latin meanings of the writs, the difference in scope between Article 32 and Article 226, the specific bodies against which they can be issued (public vs private), and concept-based statement matching.
Do not confuse
- ✘ प्रतिषेध और उत्प्रेषण में भ्रम: प्रतिषेध (Prohibition) तब जारी होता है जब कार्यवाही चल रही हो (रोकने हेतु), जबकि उत्प्रेषण (Certiorari) फैसला आ जाने के बाद निर्णय को रद्द करने या मामला स्थानांतरित करने हेतु जारी होता है।
- ✘ अनुच्छेद 32 बनाम अनुच्छेद 226 का दायरा: अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है लेकिन केवल भाग-3 के लिए सीमित है; जबकि अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकार नहीं है परंतु इसका दायरा सामान्य विधिक अधिकारों तक भी विस्तृत है।
- ✘ निजी व्यक्तियों के विरुद्ध रिट: परमादेश, प्रतिषेध और उत्प्रेषण कभी भी निजी व्यक्तियों के विरुद्ध जारी नहीं होते; केवल बंदी प्रत्यक्षीकरण ही निजी व्यक्ति के विरुद्ध जारी हो सकती है।
💡 ट्रिक: 'CPM HQ' (Certiorari, Prohibition, Mandamus, Habeas corpus, Quo-warranto) — बंदी को शरीर दो (Habeas), हम आदेश दें (Mandamus), काम रोको (Prohibition), रिकॉर्ड भेजो (Certiorari), हक बताओ (Quo-warranto)।
Directive Principles of State Policy (Articles 36-51 and Classification)
Part IV of the Indian Constitution, from Article 36 to 51, lays down the Directive Principles of State Policy (DPSP), borrowed from the Irish Constitution. Their primary objective is to establish a 'Welfare State' and ensure socio-economic democracy in the country. Although the Constitution does not formally classify them, they are traditionally categorized into Socialist, Gandhian, and Liberal-Intellectual principles based on their ideological content. Article 37 states that these principles are non-justiciable (not enforceable by courts), yet they are fundamental in the governance of the country. Dr. B. R. Ambedkar termed these principles as the 'novel features' of the Indian Constitution.
Key facts
- The concept of DPSP was borrowed from the Constitution of Ireland, which had taken it from the Spanish Constitution.
- Article 36 defines the 'State' having the same meaning as given in Article 12 of Part III.
- According to Article 37, DPSPs are non-justiciable in courts, yet fundamental in the governance of the country.
- Articles 39(b) and 39(c) are socialist principles dealing with the equitable distribution of resources and prevention of wealth concentration.
- Article 39A (Equal justice and free legal aid) was added by the 42nd Constitutional Amendment Act, 1976.
- Article 40 directs the state to organize village panchayats as units of self-government (Gandhian principle).
- Article 43B (Promotion of cooperative societies) was inserted by the 97th Constitutional Amendment Act, 2011.
- Article 44 directs the State to secure a Uniform Civil Code (UCC) for all citizens throughout India.
- Article 45 was amended by the 86th Amendment, 2002 to provide early childhood care and education for all children until the age of 6.
- Article 48A (Protection of environment, forests, and wildlife) was added by the 42nd Constitutional Amendment Act, 1976.
- Article 50 provides for the separation of the judiciary from the executive in the public services of the State.
- Article 51 directs the state to promote international peace and security and foster respect for international law.
Table
- वर्गीकरण: समाजवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 38 · मुख्य विषय: सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय द्वारा लोक कल्याण की अभिवृद्धि
- वर्गीकरण: समाजवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 39 · मुख्य विषय: संसाधनों का समान वितरण, आजीविका के साधन, समान कार्य हेतु समान वेतन
- वर्गीकरण: समाजवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 39A · मुख्य विषय: समान न्याय एवं गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता (42वां संशोधन)
- वर्गीकरण: समाजवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 41, 42, 43 · मुख्य विषय: काम का अधिकार, प्रसूति सहायता तथा कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी
- वर्गीकरण: समाजवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 43A · मुख्य विषय: उद्योगों के प्रबंधन में मजदूरों की भागीदारी (42वां संशोधन)
- वर्गीकरण: गांधीवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 40 · मुख्य विषय: ग्राम पंचायतों का संगठन एवं स्वशासन का अधिकार
- वर्गीकरण: गांधीवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 43, 43B · मुख्य विषय: कुटीर उद्योगों का विकास एवं सहकारी समितियों का संवर्धन
- वर्गीकरण: गांधीवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 46 · मुख्य विषय: SC, ST और अन्य दुर्बल वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की रक्षा
- वर्गीकरण: गांधीवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 47 · मुख्य विषय: मादक द्रव्यों, शराब और नशीली दवाओं के उपभोग पर रोक
- वर्गीकरण: गांधीवादी सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 48 · मुख्य विषय: गाय, बछड़ों तथा अन्य दुधारू पशुओं के वध पर रोक एवं नस्ल सुधार
- वर्गीकरण: उदार बौद्धिक सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 44 · मुख्य विषय: नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC)
- वर्गीकरण: उदार बौद्धिक सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 45 · मुख्य विषय: 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा
- वर्गीकरण: उदार बौद्धिक सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 48, 48A · मुख्य विषय: कृषि-पशुपालन का आधुनिक संगठन एवं पर्यावरण, वन व वन्यजीव संरक्षण
- वर्गीकरण: उदार बौद्धिक सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 50 · मुख्य विषय: कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण
- वर्गीकरण: उदार बौद्धिक सिद्धांत · संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 51 · मुख्य विषय: अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और संधियों का आदर
Practice questions (solved)
- Q 13: भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद 'कार्यपालिका से न्यायपालिका के पृथक्करण' का निर्देश देता है?
(क) अनुच्छेद 45 (ख) अनुच्छेद 48 (ग) अनुच्छेद 50 (घ) अनुच्छेद 51
- ✔ Answer: (ग) अनुच्छेद 50 — अनुच्छेद 50 राज्य की लोक सेवाओं में कार्यपालिका से न्यायपालिका के पृथक्करण का स्पष्ट प्रावधान करता है।
- Q 14: निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा राज्य के नीति निदेशक तत्वों में नहीं जोड़ा गया था?
(क) अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता) (ख) अनुच्छेद 43A (उद्योगों के प्रबंधन में कर्मकारों की भागीदारी) (ग) अनुच्छेद 43B (सहकारी समितियों की प्रोन्नति) (घ) अनुच्छेद 48A (पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्धन)
- ✔ Answer: (ग) अनुच्छेद 43B (सहकारी समितियों की प्रोन्नति) — अनुच्छेद 43B को 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा जोड़ा गया था, 42वें संशोधन द्वारा नहीं।
- Q 15: राज्य के नीति निदेशक तत्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय हैं।
2. इनका उद्देश्य भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 (ख) केवल 2 (ग) 1 और 2 दोनों (घ) न तो 1 और न ही 2
- ✔ Answer: (ख) केवल 2 — अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निदेशक तत्व गैर-न्यायोचित (अदालत द्वारा अप्रवर्तनीय) हैं, अतः कथन 1 गलत और 2 सही है।
- Q 16: सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सही कूट चुनिए:
सूची-I: (A) अनुच्छेद 40, (B) अनुच्छेद 44, (C) अनुच्छेद 48, (D) अनुच्छेद 51
सूची-II: 1. समान नागरिक संहिता, 2. ग्राम पंचायतों का संगठन, 3. अंतरराष्ट्रीय शांति, 4. कृषि एवं पशुपालन
(क) A-2, B-1, C-4, D-3 (ख) A-1, B-2, C-3, D-4 (ग) A-2, B-4, C-1, D-3 (घ) A-4, B-1, C-2, D-3
- ✔ Answer: (क) A-2, B-1, C-4, D-3 — अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायत, अनुच्छेद 44 UCC, अनुच्छेद 48 कृषि व पशुपालन तथा अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति से संबंधित है।
- Q 17: संविधान का कौन-सा अनुच्छेद मादक पेयों और हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित है?
(क) अनुच्छेद 46 (ख) अनुच्छेद 47 (ग) अनुच्छेद 48 (घ) अनुच्छेद 49
- ✔ Answer: (ख) अनुच्छेद 47 — अनुच्छेद 47 पोषाहार स्तर, जीवन स्तर में सुधार तथा हानिकारक नशीले पेयों और औषधियों के निषेध का प्रावधान करता है।
📜 Real previous-year questions (BPSC)
- [BPSC 71वीं प्रारंभिक (13 सितंबर 2025), प्रश्न 59] निम्नलिखित में से कौन-सा नीति निर्देशक तत्त्व गांधीवादी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है ?
1) ग्राम पंचायतों का गठन
2) समान नागरिक संहिता
3) ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों की प्रोन्नति
4) काम का अधिकार
(क) 1 तथा 2 (ख) केवल 2 (ग) 2 और 4 (घ) 1 और 3
- ✔ Official answer: (ग) 2 और 4 — समान नागरिक संहिता (अनुच्छेद 44) एक उदार-बौद्धिक सिद्धांत है तथा काम का अधिकार (अनुच्छेद 41) एक समाजवादी सिद्धांत है, इसलिए ये दोनों गांधीवादी विचारधारा के अंतर्गत नहीं आते हैं।
How it is asked
BPSC consistently tests DPSP through direct and matching questions on specific Article numbers, ideological classification (Socialist, Gandhian, Liberal-Intellectual), and newly inserted articles via the 42nd and 44th Constitutional Amendments.
Do not confuse
- ✘ अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता) 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया, जबकि अनुच्छेद 43B (सहकारी समितियां) 97वें संशोधन (2011) द्वारा जोड़ा गया।
- ✘ अनुच्छेद 45 अब 0-6 वर्ष तक के बच्चों की पूर्व-प्राथमिक शिक्षा से जुड़ा है, जबकि 6-14 वर्ष के बच्चों की अनिवार्य शिक्षा अनुच्छेद 21A (मौलिक अधिकार) में शामिल है।
💡 गांधीजी के 5 स्तम्भ याद रखें: 'पंचायत (40) में कुटीर उद्योग (43), SC/ST हित (46), शराबबंदी (47) और गो-रक्षा (48)'।
Fundamental Duties (Article 51A): 42nd and 86th Amendments
The original Constitution did not contain Fundamental Duties for citizens. In 1976, during the Emergency, based on the recommendations of the Sardar Swaran Singh Committee, the 42nd Constitutional Amendment Act introduced Part IV-A and Article 51A, incorporating 10 Fundamental Duties. These duties were inspired by the Constitution of the former USSR. Later, the 86th Constitutional Amendment Act (2002) added the 11th Fundamental Duty, mandating parents or guardians to provide education opportunities to children aged 6 to 14 years. Like DPSPs, Fundamental Duties are non-justiciable in nature, meaning they cannot be directly enforced by courts, though Parliament can enact laws for their enforcement. They apply strictly to Indian citizens and not to foreigners.
Key facts
- Fundamental Duties are inspired by the Constitution of the former USSR.
- Fundamental Duties were incorporated on the recommendation of the Sardar Swaran Singh Committee (1976).
- The Swaran Singh Committee recommended the inclusion of 8 Fundamental Duties.
- 10 Fundamental Duties were added under Part IV-A and Article 51A by the 42nd Constitutional Amendment Act, 1976.
- The 11th Fundamental Duty [Article 51A(k)] was added by the 86th Constitutional Amendment Act, 2002.
- Presently, there are a total of 11 Fundamental Duties under Article 51A of the Indian Constitution.
- The 11th duty places an obligation on parents/guardians to provide educational opportunities to children aged 6 to 14 years.
- The Swaran Singh Committee recommended making 'duty to pay taxes' a Fundamental Duty, which was rejected.
- Justice J.S. Verma Committee was constituted in 1999 to identify legal provisions regarding Fundamental Duties.
- Fundamental Duties are non-justiciable and apply exclusively to Indian citizens.
- Article 51A(g) includes the duty to protect and improve the natural environment (forests, lakes, rivers, and wildlife).
- Article 51A(h) mentions the development of scientific temper, humanism, and the spirit of inquiry and reform.
Table
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (a) · कर्तव्य का मुख्य विषय: संविधान का पालन, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (b) · कर्तव्य का मुख्य विषय: स्वतंत्रता संग्राम के उच्च आदर्शों को संजोना व पालन करना · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (c) · कर्तव्य का मुख्य विषय: भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (e) · कर्तव्य का मुख्य विषय: समरसता और भ्रातृत्व की भावना, स्त्रियों के सम्मान विरुद्ध प्रथाओं का त्याग · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (g) · कर्तव्य का मुख्य विषय: प्राकृतिक पर्यावरण (वन, झील, नदी, वन्यजीव) की रक्षा और संवर्धन · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (h) · कर्तव्य का मुख्य विषय: वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (i) · कर्तव्य का मुख्य विषय: सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना और हिंसा से दूर रहना · जोड़ने वाला संशोधन: 42वाँ संशोधन, 1976
- अनुच्छेद (उपबंध): 51क (k) · कर्तव्य का मुख्य विषय: 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना (अभिभावक द्वारा) · जोड़ने वाला संशोधन: 86वाँ संशोधन, 2002
Practice questions (solved)
- Q 18: भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों को किस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा शामिल किया गया था?
(क) 44वाँ संशोधन (ख) 42वाँ संशोधन (ग) 86वाँ संशोधन (घ) 73वाँ संशोधन
- ✔ Answer: (ख) 42वाँ संशोधन — 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर संविधान में भाग IV-क और अनुच्छेद 51क जोड़कर 10 मौलिक कर्तव्य शामिल किए गए थे।
- Q 19: संविधान के 86वें संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा कौन-सा मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया था?
(क) प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण करना (ख) वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करना (ग) 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बालकों को शिक्षा का अवसर प्रदान करना (घ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना
- ✔ Answer: (ग) 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बालकों को शिक्षा का अवसर प्रदान करना — 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा अनुच्छेद 51क(k) जोड़कर 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के माता-पिता या अभिभावकों पर उन्हें शिक्षा दिलाने का दायित्व सौंपा गया।
- Q 20: मौलिक कर्तव्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल संविधान में 10 मौलिक कर्तव्य शामिल थे।
2. सरदार स्वर्ण सिंह समिति ने 8 मौलिक कर्तव्यों की अनुशंसा की थी।
3. मौलिक कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर लागू होते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 और 2 (ख) केवल 2 और 3 (ग) केवल 1 और 3 (घ) 1, 2 और 3
- ✔ Answer: (ख) केवल 2 और 3 — मूल संविधान में कोई मौलिक कर्तव्य नहीं था; इन्हें 1976 में जोड़ा गया, जबकि स्वर्ण सिंह समिति ने 8 कर्तव्यों की सिफारिश की थी और ये केवल नागरिकों पर लागू होते हैं।
- Q 21: निम्नलिखित में से कौन-सी समिति मौलिक कर्तव्यों के क्रियान्वयन हेतु कानूनी प्रावधानों की पहचान से संबंधित थी?
(क) सरकारिया आयोग (ख) वर्मा समिति (ग) केलकर समिति (घ) संथानम समिति
- ✔ Answer: (ख) वर्मा समिति — न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (1999) ने मौलिक कर्तव्यों के क्रियान्वयन के लिए विद्यमान विधिक प्रावधानों की पहचान की थी।
- Q 22: निम्नलिखित में से कौन-सा एक भारत के संविधान में उल्लिखित मौलिक कर्तव्य नहीं है?
(क) संविधान का पालन करना तथा राष्ट्रध्वज का आदर करना (ख) मतदान करना और चुनावों में भाग लेना (ग) सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा से दूर रहना (घ) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करना
- ✔ Answer: (ख) मतदान करना और चुनावों में भाग लेना — मतदान करना (Voting) कोई मौलिक कर्तव्य नहीं है; स्वर्ण सिंह समिति द्वारा कर भुगतान की तरह मतदान के कर्तव्य को भी संविधान में शामिल नहीं किया गया था।
- Q 23: सरदार स्वर्ण सिंह समिति ने निम्नलिखित में से किस प्रावधान को मौलिक कर्तव्य में शामिल करने का सुझाव दिया था जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया?
(क) राष्ट्रगान का सम्मान (ख) कर अदायगी (Tax payment) (ग) वैज्ञानिक दृष्टिकोण (घ) पर्यावरण संरक्षण
- ✔ Answer: (ख) कर अदायगी (Tax payment) — स्वर्ण सिंह समिति ने 'कर अदायगी' और 'कर्तव्यों के उल्लंघन पर दंड' की सिफारिश की थी, जिसे 42वें संशोधन में शामिल नहीं किया गया था।
How it is asked
In BPSC CCE and Bihar SI exams, questions are frequently framed around the committee name (Swaran Singh), country of origin (USSR), amendment acts (42nd and 86th), total number of duties (11), and identifying which listed item is or is not a fundamental duty.
Do not confuse
- ✘ 42वें संशोधन (1976) द्वारा 10 कर्तव्य जोड़े गए थे, 11 नहीं। 11वाँ कर्तव्य 86वें संशोधन (2002) द्वारा जुड़ा।
- ✘ स्वर्ण सिंह समिति ने 8 कर्तव्यों की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार ने 10 कर्तव्य जोड़े थे।
- ✘ पर्यावरण संरक्षण अनुच्छेद 48क (DPSP - राज्य का कर्तव्य) और अनुच्छेद 51क(g) (मौलिक कर्तव्य - नागरिक का कर्तव्य) दोनों में मौजूद है; दोनों के शब्दों का अंतर ध्यान रखें।
💡 'सोवियत से स्वर्ण लेकर 42वें में 10 जोड़े, 86वें में 11वाँ शिक्षा कर्तव्य बनाया।' (USSR -> स्वर्ण सिंह -> 42वाँ संशोधन = 10 कर्तव्य; 86वाँ = 11वाँ शिक्षा कर्तव्य)
Important Landmark Cases (Kesavananda, Maneka Gandhi, Minerva Mills)
The evolution of the Indian Constitution witnessed historic judicial battles defining the power equation between Parliament and Fundamental Rights. While Shankari Prasad (1951) upheld unrestricted parliamentary power to amend rights, Golaknath (1967) prohibited Parliament from curtailing Fundamental Rights. To resolve this standoff, the 13-judge bench in Kesavananda Bharati (1973) propounded the landmark 'Basic Structure Doctrine', allowing amendments while preserving the core framework. In Maneka Gandhi (1978), the Supreme Court expanded Article 21 beyond mere 'procedure established by law' into 'due process of law' and natural justice. Finally, Minerva Mills (1980) reaffirmed that the Constitution rests on the delicate balance between Fundamental Rights and Directive Principles, establishing judicial review as an unalterable basic feature.
Key facts
- In Shankari Prasad v. Union of India (1951), the Supreme Court upheld the 1st Amendment, ruling Parliament can amend Fundamental Rights under Article 368.
- In A.K. Gopalan v. State of Madras (1950), the Supreme Court took a narrow view of Article 21, strictly adhering to 'procedure established by law'.
- In Golak Nath v. State of Punjab (1967), an 11-judge bench ruled 6-5 that Parliament cannot abridge or take away Fundamental Rights.
- The landmark judgment in Kesavananda Bharati v. State of Kerala was delivered on 24 April 1973 by the largest-ever 13-judge bench by a 7-6 majority.
- In the Kesavananda Bharati case, the Supreme Court propounded the doctrine of the 'Basic Structure' of the Constitution.
- In Indira Nehru Gandhi v. Raj Narain (1975), the Court declared free and fair elections and judicial review as part of the basic structure.
- ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla (1976), known as the Habeas Corpus case, controversially upheld suspension of Article 21 during Emergency.
- In Maneka Gandhi v. Union of India (1978), the right to travel abroad was declared part of Article 21, introducing the concept of 'due process of law'.
- The Maneka Gandhi case established the interrelationship between Articles 14, 19, and 21, termed the 'Golden Triangle'.
- In Minerva Mills v. Union of India (1980), the Court struck down clauses (4) and (5) of Article 368 added by the 42nd Amendment, nullifying unlimited amending powers.
- In the Minerva Mills case, the Court held that the Constitution is founded on the bedrock of balance between Part III (FRs) and Part IV (DPSPs).
- In S.R. Bommai v. Union of India (1994), the Supreme Court ruled that secularism is a basic feature and Article 356 is subject to judicial review.
- In I.R. Coelho v. State of Tamil Nadu (2007), it was held that laws placed in the 9th Schedule after 24 April 1973 are open to judicial review based on basic structure.
- In the ADR case (2002), the Supreme Court held that the voter's right to know the background of candidates is a Fundamental Right under Article 19(1)(a).
Table
- प्रमुख वाद: शंकरी प्रसाद वाद · वर्ष: 1951 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है।
- प्रमुख वाद: ए.के. गोपालन वाद · वर्ष: 1950 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: अनुच्छेद 21 की संकीर्ण व्याख्या; केवल कार्यपालिका की मनमानी के विरुद्ध संरक्षण।
- प्रमुख वाद: गोलकनाथ वाद · वर्ष: 1967 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: संसद भाग-III (मौलिक अधिकारों) में कोई कटौती या संशोधन नहीं कर सकती।
- प्रमुख वाद: केशवानंद भारती वाद · वर्ष: 1973 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: संविधान के 'आधारभूत ढांचे' (Basic Structure) का सिद्धांत; 24 अप्रैल 1973।
- प्रमुख वाद: इंदिरा नेहरू गांधी वाद · वर्ष: 1975 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव और न्यायिक समीक्षा को मूल संरचना माना गया।
- प्रमुख वाद: ए.डी.एम. जबलपुर वाद · वर्ष: 1976 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: आपातकाल में अनुच्छेद 21 का निलंबन मान्य माना गया (बंदी प्रत्यक्षीकरण वाद)।
- प्रमुख वाद: मेनका गांधी वाद · वर्ष: 1978 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: अनुच्छेद 21 में विधि की उचित प्रक्रिया, विदेश गमन का अधिकार, स्वर्णिम त्रिकोण।
- प्रमुख वाद: मिनर्वा मिल्स वाद · वर्ष: 1980 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: मौलिक अधिकार एवं DPSP में संतुलन; संसद की संशोधन शक्ति सीमित है।
- प्रमुख वाद: एस.आर. बोम्मई वाद · वर्ष: 1994 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: अनुच्छेद 356 की न्यायिक समीक्षा तथा पंथनिरपेक्षता को मूल ढांचा घोषित किया गया।
- प्रमुख वाद: आई.आर. कोएल्हो वाद · वर्ष: 2007 · मुख्य विषय / न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की भी न्यायिक समीक्षा संभव।
Practice questions (solved)
- Q 24: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान के 'आधारभूत ढांचे' (मूल संरचना) का सिद्धांत किस ऐतिहासिक वाद में प्रतिपादित किया गया था?
(क) गोलकनाथ वाद (1967) (ख) केशवानंद भारती वाद (1973) (ग) मिनर्वा मिल्स वाद (1980) (घ) शंकरी प्रसाद वाद (1951)
- ✔ Answer: (ख) केशवानंद भारती वाद (1973) — केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (24 अप्रैल 1973) में 13 जजों की पीठ ने संविधान के 'मूल संरचना' के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।
- Q 25: निम्नलिखित में से किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि 'संविधान मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन की आधारशिला पर निर्मित है'?
(क) मेनका गांधी वाद (ख) ए.डी.एम. जबलपुर वाद (ग) मिनर्वा मिल्स वाद (घ) इंदिरा साहनी वाद
- ✔ Answer: (ग) मिनर्वा मिल्स वाद — मिनर्वा मिल्स वाद (1980) में न्यायालय ने मौलिक अधिकारों और DPSP के मध्य संतुलन को संविधान की मूल विशेषता बताया।
- Q 26: विदेश यात्रा के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत दैहिक स्वतंत्रता का भाग किस वाद में घोषित किया गया?
(क) ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (ख) मेनका गांधी बनाम भारत संघ (ग) आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (घ) एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ
- ✔ Answer: (ख) मेनका गांधी बनाम भारत संघ — मेनका गांधी वाद (1978) में पासपोर्ट जब्त करने के मामले में न्यायालय ने विदेश यात्रा के अधिकार को अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग माना।
- Q 27: आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) वाद मुख्य रूप से संविधान की किस अनुसूची की न्यायिक समीक्षा से संबंधित है?
(क) सातवीं अनुसूची (ख) आठवीं अनुसूची (ग) नौवीं अनुसूची (घ) दसवीं अनुसूची
- ✔ Answer: (ग) नौवीं अनुसूची — कोएल्हो वाद (2007) में निर्धारित हुआ कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की मूल संरचना के उल्लंघन पर न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
- Q 28: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गोलकनाथ वाद (1967) में संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने से रोक दिया गया था।
2. केशवानंद भारती पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सीकरी ने की थी।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(क) केवल 1 (ख) केवल 2 (ग) 1 और 2 दोनों (घ) न तो 1 और न ही 2
- ✔ Answer: (ग) 1 और 2 दोनों — गोलकनाथ वाद में मौलिक अधिकारों में संशोधन पर रोक लगी तथा केशवानंद भारती पीठ के मुख्य न्यायाधीश सर्व मित्र सीकरी (S.M. Sikri) थे।
- Q 29: सर्वोच्च न्यायालय ने किस वाद में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) लगाने की प्रक्रिया को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना तथा धर्मनिरपेक्षता को मूल ढांचा बताया?
(क) एस.आर. बोम्मई वाद (1994) (ख) राजनारायण वाद (1975) (ग) ए.डी.एम. जबलपुर वाद (1976) (घ) शंकरी प्रसाद वाद (1951)
- ✔ Answer: (क) एस.आर. बोम्मई वाद (1994) — एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में अनुच्छेद 356 की न्यायिक समीक्षा और पंथनिरपेक्षता को मूल संरचना का भाग माना गया।
How it is asked
BPSC frequently tests landmark judicial cases through direct questions (identifying the case associated with Basic Structure, right to travel abroad, or judicial review of the 9th Schedule) as well as statement-based matchings.
Do not confuse
- ✘ गोलकनाथ (1967) बनाम केशवानंद भारती (1973): गोलकनाथ में न्यायालय ने कहा कि संसद मौलिक अधिकार घटा ही नहीं सकती, जबकि केशवानंद में कहा कि संसद संशोधन तो कर सकती है पर 'मूल ढांचे' को छू नहीं सकती।
- ✘ ए.के. गोपालन (1950) बनाम मेनका गांधी (1978): गोपालन वाद में अनुच्छेद 21 के तहत केवल 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' की संकीर्ण व्याख्या थी, जबकि मेनका गांधी वाद में इसे अमेरिकी अवधारणा 'विधि की सम्यक प्रक्रिया' (न्यायपूर्ण, उचित और निष्पक्ष) के रूप में विस्तृत किया गया।
- ✘ 42वां संविधान संशोधन (1976) बनाम मिनर्वा मिल्स (1980): 42वें संशोधन ने संसद की संविधान संशोधन शक्ति को असीमित कर दिया था, जिसे मिनर्वा मिल्स वाद में असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किया गया।
💡 याद रखें कालक्रम: 'शंकरी ने बोला (गोलक) -> केशव ने ढांचा बनाया -> मेनका विदेश गई -> मिनर्वा ने संतुलन बनाया' (1951 -> 1967 -> 1973 -> 1978 -> 1980)
Quick revision
- Fundamental Rights are enshrined in Part III (Articles 12-35) of the Constitution, inspired by the US Constitution.
- Originally there were 7 Fundamental Rights, but the Right to Property (Art 31) was removed by the 44th Amendment Act 1978 and made a legal right.
- Currently, there are 6 Fundamental Rights: Right to Equality, Freedom, Against Exploitation, Freedom of Religion, Cultural & Educational Rights, and Constitutional Remedies.
- Under Article 32 (Supreme Court) and Article 226 (High Courts), 5 types of writs can be issued: Habeas Corpus, Mandamus, Prohibition, Certiorari, and Quo-Warranto.
- Directive Principles of State Policy (DPSP) are in Part IV (Articles 36-51), borrowed from the Irish Constitution.
- DPSPs are non-justiciable and categorized into Socialistic, Gandhian, and Liberal-Intellectual principles.
- Fundamental Duties were added to Part IV-A (Article 51A) via the 42nd Amendment Act 1976 on the recommendation of the Swaran Singh Committee.
- Originally 10 duties were added, and the 11th duty (education for children aged 6-14) was added by the 86th Amendment Act 2002.
- Kesavananda Bharati case (1973) established the 'Basic Structure Doctrine' of the Constitution.
- Maneka Gandhi case (1978) expanded Article 21 by linking 'procedure established by law' with 'due process of law'.
- Minerva Mills case (1980) emphasized that the Constitution is founded on the bedrock of balance between Fundamental Rights and DPSPs.